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क्या आप एक कार्यकर्ता को याद रखना चाहेंगे?

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एक नेता को खड़ा करने से लेकर उसे लोकप्रिय बनाने तक में सैंकड़ो कार्यकर्ताओं का श्रम होता है।  यही सत्य किसी पार्टी के लिए भी है। किसी पार्टी को खड़ा करने एवं लोकप्रिय बनाने में कई नेताओं एवं उनके पीछे हजारों-लाखों कार्यकर्ताओं का श्रम होता है। बाद में पार्टी या उसके मजबूत नेता तो याद रखे जातें हैं लेकिन कार्यकर्ता भूला दिए जातें हैं चाहे वह कार्यकर्ता कितना ही श्रमिक, चिंतनशील क्यों न हो। आज के समय में बड़ी  पार्टियों में ऐसा बहुत कम सुनने को मिलता है कि कोई कार्यकर्ता अपने क्षेत्र में नेता से ज़्यादा लोकप्रिय हो गया हो और पार्टी इसे ध्यान में रखते हुए उसे उम्मीदवार घोषित कर दी हो। कार्यकर्ताओं का यह सपना ही रह जाता है। यह एक सपना जैसा ही है कि एक साधारण परिवार से आने वाले कार्यकर्ता को पार्टी टिकट दे दे। आज का यह सत्य है की पार्टी अपने टिकट का बंटवारा व्यक्ति के आर्थिक सामर्थ्य के आधार पर करती है। मान लीजिये पार्टी ने कार्यकर्ता की अगाध लोकप्रियता से प्रभावित होकर उसे टिकट देने का फ़ैसला कर लिया तो क्या ऐसा हो सकता है कि वह कार्यकर्ता टिकट लेने से मना कर दे। क्या वह इतना सा...

मुझे फिर गिरने न दिया जाए(GAZAL)

महे को आफ़ताब से मिलने न दिया जाए फ़लक पर रौशनी को बिखरने न दिया जाए * हर तरफ़ ख़ामोशी व ख़ामोशी छाई है है सारी कोशिश कि बोलने न दिया जाए * महक़मा पहुचते ही क़दम लड़खड़ाने लगे सम्भाल साक़ी मुझे कि फिर गिरने न दिया जाए --राहुल सिंह 

फिर से की जा रही है बात विकास की...

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 हाँ, फिर से की जा रही है  बात विकास की वही विकास जो है किसानों के गले में पड़नेवाला रेश्मी फाँसी का फंदा वही विकास जो पैदा करता है स्थिति 'आगे कुआँ पीछे खाई' का अगर इसका साथ दो तो खोते हो अपना जमीं जिस पर लगता है फैक्ट्री जो हवा में घोलता है धुँआ नदी में घोलता है ज़हर अगर करते हो इसका विरोध तो कहलाते हो प्रगति के राह में रोड़ा और कभी-कभी देशद्रोही भी                                   ~  राहुल सिंह  

सत्ता से सवाल करना सीखो

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उस समय भी तुम में से कोई मेरे साथ खड़े नहीं हुए थे और आज भी नहीं हो... उस समय भी मेरी बात नही समझे थे आज भी नहीं समझना चाहते... हर मुद्दे को भटकाने के लिये एक मुद्दा है.. हर जुमले को छिपाने के लिये एक जुमला है .. पहले काँग्रेस ने उल्लू बनाया और अब भाजपा अपना उल्लू सीधा कर रही है... सरकार से सवाल करना नहीं सीखे तो कल कोई तीसरा तुम्हें मूर्ख बना रहा होगा... तुम हर बार अपना हाथ इसलिए जलओगे की थोड़ा हाथ जलने के बाद रोटी ज़रूर नसीब होगी लेकिन रोटी आज भी तुमसे कोसों दूर है कल भी होगी... बस चेहरे दूसरे होंगे सरकार दूसरी होगी... नहीं समझना चाहते मत समझो... लेकिन मैं तुमलोगों की तरह ख़ास तरह का अंधा और गूँगा नहीं हूँ... मैंने कल भी आवाज़ उठाया था आज़ भी उठा रहा हूँ.. ©  राहुल सिंह (चित्र भी मेरे द्वारा ही लिया गया है ) 

जनता हो परेशान...हम तो चले जापान! (गीत)

जनता हो परेशान  हम तो चले जापान  रे भैया  हम तो चले जापान  जनता हो परेशान.. बड़े दिनों से पाई पाई जोड़  पैसा रखा बचाय  थोड़े से छप्पर छावायें  और बेटी लें बियाह   रे भैया  कैसे लें बियाह  रे भैया  कैसे लें बियाह   पैसा सब पानी भया  जब से फ़रमान दिया सुनाय(२)  जनता हो परेशान ...  घर बार सब छोड़ आए  कुछ पैसा लें कमाय (२) अपना कर्जा लें उतार  रे भैया  कैसे लें उतार  की लम्बी भ गयी क़तार  रे भैया  लम्बी भई कतार (२) जब से फ़रमान दिया सुनाय  जनता हो परेशान...  बड़े जतन से खेत जोत कर  हेंगा दिया चलाय  आज शाम पटवन करके  बीज लेंगे मंगाए  रे भैया  कैसे लें मंगाए की भ गया बंद नोट  रे भैया  भ गया बंद नोट   जब से फ़रमान दिया सुनाय  जनता हो परेशान...  ©  राहुल सिंह

खुश मत होइये! कालाधन कहीं नहीं जाने वाला!

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500/1000 के नोट बंद कर दिए गए हैं। इससे कालाधन ख़त्म हो जायेगा, भ्रस्टाचार पर नकेल कसेगा, आतंकियों को पहुँच रहे आर्थिक मदद पर भी रोक लगेगा आदि। इसे सुनते ही हम ख़ुशी से झूमने लगे, गाने लगे। हालाँकि थोड़ा असहज भी हुए क्योंकि किसी के घर में शादी है, कोई विद्यार्थी पॉकेट में 500 नोट रख़ ढ़ाबे पर खाने निकला इसके वावजूद हम प्रधानमंत्री के भाषण को ध्यान में रखकर ख़ुश ही हुए की थोड़े दिनों की दिक़्क़त है बाद में 'बागों में बहार' होगा ही। भारत में बड़े नोटों पर रोक पहली बार नहीं लगाया गया है। 1978 में 1000रु के नोट बाज़ार से हटा लिए गए थे। तो क्या तत्कालीन समय में कालाधन, भ्रस्टाचार ख़त्म हो गया था? क्या बागों में बहार आ गया था ? अगर ऐसा हुआ था तो फिर से 1000 रु के नोट का वापसी क्यों हुआ था ? क्या उस समय किसी दल, पार्टी ने इसके विरोध में प्रदर्शन किया था ? हमलोग जो इस बात की खुशियाँ मना रहे हैं की जिनके घर पर नोटों के गद्दे बने हुए थे, तहख़ाने नोटों से भरे हुए थे उनकी तो खटिया खड़ी हो जायेगी तो खुश होने की जरुरत नहीं है। कालाधन को सफ़ेद करने वाले संस्थान जैसे मंदिर, दरगाह , NGO, trust, बाबाओं के...

ऐ क़लम तुम डरते हो क्या

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                                                                                                       ऐ क़लम तुम डरते हो क्या                                                       तिल-तिल कर मरते हो क्या                                                                                                               ...

मिट्टी का सामान बनाना कितना मुश्क़िल?

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दिवाली पर चीन का सामान नहीं खरीदना है । ज्यादा से ज्यादा हिंदुस्तानी, मिट्टी से बने चीजें खरीदनी है। इससे कुम्हारों की आमदनी में वृद्धि होगी, भारत का पैसा विदेश जाने से बचेगा, मिट्टी के सामान बनाने की कला को बढ़ावा मिलेगा आदि आदि । वैज्ञानिक रूप से भी मिट्टी के सामान का प्रयोग करना अच्छा है । इससे वातावरण को खतरा नहीं होता और तो और टूट जाने पर यह फिर से मिट्टी में आसानी से मिल जाता है । कई लेखों में इस बात पर भी ध्यान आकर्षित कराया गया कि बल्ब की रौशनी से कीड़े आकर्षित होते हैं, मरते नहीं हैं जबकि दीप की लौ में जलकर कीड़े-मकौड़े मर जाते हैं ।  यह हम सब जानते हैं कि फ़्रीजर में रखा पानी से अच्छा घड़ा का पानी पीना होता है लेकिन हम में से कितने लोग इसका पालन करते हैं । मिट्टी के वर्तन में पका व्यंजन का स्वाद शायद ही अब किसी को याद हो । दिवाली पर जो 'चीन की रौशनी' के बदले भारतीय दीया खरीदने की जो अपील की जा रही है इससे कितना मिट्टी के सामान के व्यापार में सुधार आयेगा इसे समझने की जरुरत है। क्या पहले भी कभी ऐसी अपील की गयी थी ? क्या उस समय किसी नेता, समाज सेवक, कवि, लेख़...

*Aalaha-Udal*

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                                             आल्हा-ऊदल इतिहास हमेंशा शासकों द्वारा ही लिखा गया है। राजा-महाराजा शिलाओं पर, गुफ़ाओं में, भोजपत्रों पर अपने और अपने वंश के बारे में लिखवाया करते थें। हर दरबार में राज कवि, लेख़क, चित्रकार आदि हुआ करते थें। लेखक, कवि आदि राज के प्रशंसा में कविताएँ एवं कहानियाँ गढ़ा करते थे इससे राजा खुश होकर उन्हें कीमती उपहार दिया करते थे। राजा की आलोचना न करने में लेखकों का हमेशा राजमहल के सुख भोगने एवं राजा के प्रसंसा के पात्र बने रहने का स्वार्थ निहित रहता था।  ऐसे लेखकों, कवियों, चित्रकारों को चाटुकारिता के जनक कहना गलत नहीं होगा। ऐसे ही  लेखकों, कवियों के कारण जनमानस की पीड़ा शासक तक नहीं पहुँचती। भले ही उनकी भाषा शैली कितनी ही अच्छी क्यों न रही हो, भले ही उन्होंने लेखन में नयी विधा की खोज की हो, भले ही वो भाषा/व्याकरण के महान ज्ञाता माने जाते हों, संस्कृत के प्रकांड पंडित हों, पिण्डलाचार्य कहे जाते हो अगर वे जनमानस की ...

*हाथी और गाड़ी*

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सड़क पक्की हो गयी है। गाड़ियां पूरी रफ़्तार से, बिना किसी हचक के, अब दौड़ती हैं। तरह-तरह की गाड़ियां, कुछ नीले, कुछ लाल कुछ हरे, कुछ काले जैसे काल छोटी गाड़ियां, बड़ी गाड़ियां दुपहिया, तिपहिया, चारपहिया कुछ ऐसे की पहिया ही पहिया छोटी पहिया, बड़ी पहिया कुछ के भीतर ट्यूब तो कुछ ट्यूबलेस पहिया अलग-अलग पावर की गाड़ियां जितना ज्यादा पावर, उतना ज्यादा दाम अलग-अलग डिजाईन की गाड़ियां कोई बना रफ़्तार के लिए तो कोई काम के लिए कोई ढोता आदमी को तो कोई सामान को जैसा काम वैसा डिजाईन अलग-अलग भूख वाली गाड़ियां कोई खाता ड़ीजल, कोई पेट्रोल तो किसी को पसंद सी.एन.जी जितना  ज़्यादा पावर उतनी ज्यादा भूख सड़क पर चौड़ी होकर चलती गाड़ियां सड़क पर अधिकार जमाती गाड़ियां हर समय चलती गाड़ियां बिना थके तेज़ी से दौड़ती गाड़ियां धुँआ छोड़ती गाड़ियां लोगों के फेफड़े में कालिख जमाती गाड़ियां तीख़ी आवाज़ से लोगों को डराती गाड़ियां मनमानी करती गाड़ियां, हठि गाड़ियां भूख सहन नहीं करती गाड़ियां बिना खाये एक कदम भी नहीं चलती गाड़ियां  चालक की पकड़ ढीली पड़ते ही काल बन जाती गाड़ियां कहीं -क...

*अबकी बार 56 इंच की छाती पर गोली भी खाने को तैयार !*

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लोकसभा के चुनाव में मौजूदा सरकार के जुमलों का कमाल हमसब देख चुकें हैं । अपने जुमलों के ही कारण भाजपा पूर्ण बहुमत पाने में कामयाब हुई थी। बाद के चुनाओं में भले ही इस वेवफ़ा सरकार को इन्हीं जुमलो के  कारण हार मिली हो लेकिन ये उन पार्टियों में से नहीं है जो अपनी हार से सीख लेकर अपनी नीति बदल दे। आप देख ही चूके हैं कि दिल्ली हार जाने के वावजूद भी इसने अपनी 'जुमला नीति' को नहीं त्यागा और बिहार चुनाव प्रचार में भी बखूबी इस्तमाल किया। जैसे माननीय प्रधानमंत्री बोलते दिखाई दिए थे की चुनाव जीतने के बाद वो बिहार को 1.25 करोड़ रुपये का फंड देंगे। लेकिन शायद बिहार की जनता को बात समझ नहीं आयी या फिर यह हो सकता है की वो वेवफ़ा से दिल न लगाना चाहती हो। इन सभी चीज़ो के वावजूद भाजपा का जुमला प्रेम बना हुआ है चाहे उसका रूप बदल गया हो।   ऊ.प्र विधान सभा चुनाव अगले साल होने जा रहा है। जुमले बनने शुरू हो गए हैं। थोड़ा रूप बदला हुआ जरूर है पर है वही जुमला। जो लोग व्हाट्सएप्प चलाते हैं उन्हें प्रायः मिलता रहता होगा। सिर्फ भाजपा की ही बात करे  तो बाकी पार्टियों के साथ नाइंस...

पास या फेल ?

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"देख मयंक मै तेरा दोस्त हूँ इसलिए समझा रहा हूँ। इसबार कैडर ज़रूर कर लेना। अब उम्र भी तो होगयी है, आखिर कब तक बैरेक मे रोटियाँ बेलता रहेगा? तरक्की हो जायेगी तो पैसे अच्छे मिलेंगे और साथ के साथ इज्ज़त भी मिलेगी। भोला को अच्छे स्कूल मे पढ़ा पायेगा। अच्छा कोचिंग दिलवा  पायेगा"।         'लेकिन यार सुरेश कैडर कर के भी क्या फायदा ? बिना बारहवीं किये तरक्की होने से रही और मै ठहरा दसवीं पास और वो भी थर्ड क्लास से' : मयंक ने तर्क किया। 'तो इसमें परेशान होने वाली कौन सी बात है ? देख डिपार्टमेंट की तरफ़ से एक लेटर बनवा फिर किसी भी स्कूल से परीक्षा दे दे' : सुरेश ने कहा । 'यार सुरेश अब पढ़ाई कौन करे इस बुढापे मे ? और लाख कोशिश कर लू क्या मुझे अब विषय समझ आयेंगे ? रोटियाँ ही बेलना सही है' : मयंक ने पुनः तर्क किया । 'यार मयंक मै हूँ न। हेडक्वाटर के ऑफीस मे अभी  उतना काम होता नही है, शाम मे बिलकुल फ्री रहता हूँ उस वक़्त तुझे गाईड कर दिया करूँगा। वैसे भी मेस शाम 8:30 बजे के बाद बंद ही हो जाता है ': सुरेश ने आशवस्त किया । मयंक मुस्कुरते हुए कहा, "ओ...

न जाने किसलिए/Na jaane kisliye (shayari)

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# न जाने किसलिए # दिल मे अरमा लिये , लोग भटक रहे न जाने किसलिए पूरी हो जाए मुराद , घुम  रहे सारे इसलिए किसी ने पत्थर मे रब तराशा तो किसी ने मक्का मे खुदा तलाशा मैंने देखा है उसको तुझमे , कहीं और फ़रियाद करुँ मै किसलिए मन कि गलियारे मे पसरा है अंधेरा शबे बरात पर शायद दीपक जलाते है इसलिए अगर साफ हो हर मन , फिर पर्दा करे कोइ किसलिए कहती है वो मुझसे कि सच्चा प्यार है मेरा उससे पुछ रहे हैं मेरे हर हर्फ़ , किसी और से दिललगी फिर किसलिए  (  © राहुल सिंह)                                                                                                                                   ...

गीत/GEET

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                                            # गीत # छीन गया है आशियाना छीन गया है मुँह का निवाला हो गया हूँ मैं बेतहाशा  जाऊँ मैं अब कहाँ                                       ऐ मेरे मौला तू ही बता  जब भी दो कदम आगे है हमने बढ़ाया सीमाएँ बाँध दी गयी है  आसमां में भला अब कैसे उड़े कोई परिंदा आसमाँ भी बाँट दी गई है  मेरा आशियाँ छीन गया है  जाऊँ अब मैं कहाँ  ऐ मेरे मौला तू ही बता ...                                                                               (  © राहुल सिंह)   ...

KOI TO HO (SHAYARI)

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                                    #कोई तो हो# तन्हा है ये जीवन , इसमे कोई शोर तो हो अकेला चल पड़ा है राही , कोइ हमराह तो हो माना कि यहाँ आना है अकेला , और जाना भी सफ़र का कोइ रहनुमा तो हो                         न चमकता कोइ मोती ,  निखरती न कोइ खूबसूरती गर इनमें पानी न हो लाख तारे हो साथ , चमकता क्या चांद गर सूरज न हो ? बेरंग है हर वो महफिल , बेसूरे हैं हर वो नग़मे  जिनमें तु न हो  ॥                               (  © राहुल सिंह)                                       ...

Poem( कर्म-पथ )

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तू  चलता चला-चल, तू  चलता चला-चल पीछे मुड़कर मत देख कि कौन आ रहा है तू अपने ही पदचिन्हों को बढ़ाता चला-चल          (  © राहुल सिंह) नदी ने कहा था कब धरती से मुझे रास्ता दिखाती चली-चल वह खुद ही मुड़ी, जहाँ था उसे मुड़ना वह खुद ही ठहरी थी, जहाँ था ठहरना तू भी अपना रास्ता बनाता चला-चल तू  चलता चला-चल, तू  चलता चला-चल         (  © राहुल सिंह) बसंती हवा जब मस्ती में बही थी वृक्षों में थी उलझी, पर्वतों ने था रोका हर किसी को झुमाती, झुकाती चली ओ हर बाधाओं को पार करता चला-चल तू भी मस्ती में गुनगुनाता चला-चल तू  चलता चला-चल, तू  चलता चला-चल॥                                             ( © राहुल सिंह)

Lyrics(विरह)

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तुम  बिन कैसा दिवस, कैसी रैन रे  तुम बिन एक पल भी अब न चैन रे जब से गए तुम पिया परदेश दशहरा बिता सूना, दिवाली भई अंधेर  होली भी बीत गयी बेरंग रे तुम्हरी राह तकत-तकत सूख गए मोरे भींगे नैन रे  तुम  बिन कैसा दिवस, कैसी रैन रे तुम बिन एक पल भी अब न चैन रे कह कर गए थे आओगे जल्दी शर्दी बीति, गर्मी बीती, आई अब बदरिया कि बेला रे जब-जब ये गरजे, जिया मोरा धडके गिर न जाये माटी का ये घर रे तुम बिन कटे नाहि मोरा जींदगी के कोइ पल रे         (few lines are to be added)                                    Lyrics by Rahul Singh                                 

LYRICS(LOVE SONG)

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बातें दिलों की तुम्हें बता न सका  कितना प्यार है मुझे , ये जता न सका  तुम सामने से गुजरती रही  और मै  तुम्हे कभी टोक न सका   दिल में दबे जो अरमा थे   होठों पर करने को जो बातें थी photo taken from google वो कभी  हो न सके  फ़ूहड़ बाँस से बने इन पन्नों को   प्यार की स्याही में डुबाया   दिल में बसी चाहत को  अलंकारों से सजाया मंच पर खड़ा किसी कवि सा तनहाई  में भुनभुनाया  लेकिन, बातें दिलों की तुम्हें बता न सका कितना प्यार है मुझे , ये जता न सका ( © राहुल सिंह) तुम सामने से गुजरती रही  और मै  तुम्हे कभी टोक न सका   उड़ते  हुए इन भँवरो सा, मै भी तो घुमा था ( © राहुल सिंह) जमाने मे हुए आशिको सा, मै भी तो खुद को भूला था फिर क्या कमी रह गयी  जो तू मेरे आँखों में खुद को देख न सकी मै तो ठहरा पागल, जो  बातें दिलों की तुम्हें बता न सका कितना प्यार है मुझे , ये जता ...

IRONY

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तुम क्यों नहीं सुनती ! तुम हो                                                                कहीं न कहीं तुम जरूर हो मुझे यकीन है, भले ही दुनिया को न हो । लोग मुझे पागल समझते हैं जब मैं बात करता हूँ, इन दीवारों से इन पंछियों से, इन घटाओं से नदियों से , हवाओं से खेतों से , खलिहानों से ह ह-ह-ह-ह ये मूर्ख क्या समझे भावनाओं को क्या पहचाने संदेशवाहकों को जब मंदिर में पड़ी पत्थर की मूर्ति और कहीं दूर बसी प्रियेसी सुन सकती है अपने प्रिय की आवाज़ तो नानी तुम क्यों नहीं ! तुमने तो केवल अपना वृद्ध देह त्यागा है ॥                                              ~Poem by Rahul Singh

LYRICS

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भाग्य पर तू क्यों रोए रे साथी भाग्य तो बस एक शब्द रे हाथ की लकीरों में क्यों उलझे है यह तो बस मुठी की एक नींव रे उठ और मेहनत कर ले तभी मिलेगी तुझे जीत रे तभी मिलेगी तुझे जीत रे मिलेगी मंजिल कबतलक ये क्यों बार-बार तू सोंचे रे तेरा काम राह पर चलना तो चला चल राही रे कभी तो मिलेगी तुझे तेरी मंजिल रे किस्मत के धागे में तू क्यों उलझे है पहन ले कर्म का जामा रे बह रही हो लहरे चाहे तेरे विपरीत छोड़ ना सब्र की नैया रे कभी तो बहेंगे मौजे तेरे संग रे ॥                                                                      -Lyrics by Rahul Singh