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राहुल सिंह की चार कविताएँ

राहुल सिंह की चार कविताएँ

हाँ, वे पुलिसवाले ही थे!/ haan, ve police waale hi the

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          हाँ , वे  पुलिसवाले ही थे! आँखे सुबह खुले नहीं थे , कि तीन-चार मुस्तनदे घर घुस आए थें।          आते ही “अंकुर-अंकुर” कह चिल्लाए थे । मोटे तन पर ख़ाकी वर्दी , तिस पर था एक मोटा कोट ।   भृकुटि तनी हुई , चेहरे धधकते हुए हाथ मे मोटी थी लाठी , दिखने मे तो पुलिस जैसी ही थी उनकी कद-काठी। अरे! हाँ, वे पुलिसवाले ही थे!   गालियां थी उनके हर सवाल में । बात-बात पर दो-चार थप्पड़ जड़ देते थे , अंकुर कहाँ है ? बस यही बार-बार पूछते थे। हमने कहा रहते तो यहीं हैं , लेकिन कहीं गये हैं। सच कहता हूँ  , कहाँ गये हैं ? हमे मालूम नहीं है। डालो गाड़ी मे , ले चलो थाने , डालेंगे हावालात में  , करेंगे इनकी कुटाई , तब बतलाएंगे कि अंकुर कहाँ है। यह सुनकर हम सब घबड़ाये , बड़ी हिम्मत कर के पूछे: हुआ क्या है ? हमारी गलती क्या है ? कृपया हमे बतलाए। “नारायण” , तुमलोग का भगवान जानते हो न उसे ? हुआ उसी का कत्ल है। क्यों... ...

वायदा प्यार का

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                  वायदा प्यार का(कहानी)   दिन के कोई ढाई बज रहे थे। गंगा घाट पर बिल्कुल सन्नाटा छाया हुआ था। गर्म हवा के सनसनाहट और लहरो के उफान कि आवाजे साफ सुनाई पड रही थी कि तभी किसी कि सिसकने कि आवाज सुनाई दि । एक लडकी आँख  मे आँसू  लिए बडी तेजी से गंगा तट कि ओर बढ रही थी।वह NIT कालेज कि छात्रा संध्या थी। वह गंगा मे छलांग लगाने ही वाली थी कि उसे किसी ने अपनी तरफ खींचा , सहसा उसका सम्मोहन टूटा और वह विवेक को देखते ही रोने लगी। अपनी सिसकियो भरी आवाज मे कहने लगी छोड दो मुझे , मर जाने दो मुझे... तुम सही थे... उसने मुझे धोखा दिया...उसे मुझसे कभी प्यार था ही नही... उसने मेरा इस्तमाल किया है... दरअसल संध्या और विवेक एक ही गांव से थे। दोनो के घर-परिवार का आपस मे गहरा संबंध था। दोनो ने साथ मे स्कूल कि पढाई की थी , इंजिनियरिंग कालेज मे भी दोनो ने एक साथ दाखिला लिया था। संध्या को हमेशा से शहरी संस्कृति अपनी ओर आकर्षित करते थे। उसे हमेशा सलवार-कमीज मे जकड़ा रहना बिल्कुल पसंद नही था। शहर आ...

बातें बड़ी -बड़ी (story)

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                      बातें  बड़ी -बड़ी  स्टेशन पर काफी भीड़ थी। यात्री प्लेटफम पर ट्रेन का इंतजार कर रहे थे। तभी घोषणा हुई “यात्रीगण कृप्या ध्यान दे। जयपुर से अहमदाबाद को जाने वाली आला-हजरत एक्स्प्रेस कुछ ही समय मे प्लेटफर्म संख्या 4 के बजाए 3 पर आ रही है। आपकी असुविधा के लिये हमे खेद है”। यह सुनकर लोग प्लेटफार्म संख्या 3 कि ओर तेजी से बढने लगे। कुछ समय के बाद ट्रेन भी वहाँ पहुंच गयी। लोग शिघ्रता से उस पर चढने का प्रयास करने लगे। मै भी बहुत दिक्कतों के बाद रिजर्वेशन अनुसार कोच संख्या 6 में चढ पाया। रिजर्वेशन कोच में भी काफी भीड़ थी । जेनरल कोच में पर्याप्त जगह न होने के कारण लोग शयनयान कोच में आ गए थे। मेरे सीट पर भी पहले से चार व्यक्ति बैठे हुए थे। मैंने उनसे हटने का आग्रह किया। उनलोगो ने मुझसे कहा कि उन्हे अगले स्टेशन तक ही जाना है मैं इसी मे ही एडजस्ट कर लूँ । उन से जोर जबरदस्ती का कोइ फायदा न था अत: मै भी किसी तरह उनके बीच घुस कर बैठ गया और टी.टी.ई का इंतजा...

THE LAST LOVE LETTER(4th part)

Dear readers, here is 4th part of the novel series THE LAST LOVE LETTER. Sorry for the delay. Hope you will enjoy this part also. Read it fast as next part is waiting for you.                     THE LAST LOVE LETTER(4th part) I don't know why I got upset after that incident. I put my head down and after some time my bus also drove me away from the rubbish place. That day I didn't eat properly and even my eyes were refusing to shut down. I was upset having no reason. I thought again and again and tried to find the reason for my upset mind, that day I came to know about a universal truth, "Any precious thing is priceless until there is recognizer of the same. Same thing was there, Heena was just a friend for me before the incident but this incident grew feelings for her inside my heart. And this feeling is known as love. Ye, this was love only. Beta jaldi utho, school nhi jana kya? I heard the voice of my mother. 'Mom...

THE LAST LOVE LETTER(3rd part)

Here is 3rd part of " THE LAST LOVE LETTER ". To read 1st and 2nd part click on the bar "THE LAST LOVE LETTER(NOVEL-SERIES). To read next parts keep visiting kora-kagaj . You can contact the writer at whatsapp now. WHATSAPP NO. 8239970030 .                                                           (3)  My mind kept judging her and her attitude and lastly I commanded my minds to let her be what she is.  After that day my school went normally. She used to ask me for notebooks and also took help in subjects. In few days we became good friends. My hesitations started reducing day by day and in no time I became frank to her. I started sharing my views to her. I became more open to her. But our relationship was confined to friendship only. I liked her but not in the sense of girlfriend. I loved her but this was only friendship lo...

THE LAST LOVE LETTER(NOVEL-SERIES)

                    BEFORE YOU READ This story is based on a real incident. It is about a boy and a girl, both from same state but from different places,both from same school but of different religion. Their first meeting was accidental but soon they become good friend and gradually friendship turned into love. Will their love get success instead of having powerful resistance like caste and religion?  Let's find out. The story has been written in first person. read it and enjoy it. THE LAST LOVE LETTER It was Sunday morning. I was purchasing rations and kitchen materials from a shop. I asked the shopkeeper the rate of “kala channa”,Rs 45 per kg, he replied. I heard the sound “naye aadmi ko dekhe nahi ki lage lootne,kala channa 45 ki nahi 40 ki hai”.It was coming from back, I turned back and surprisingly the words were being spelled by a girl. I looked at her and then shopkeeper. Shopkeeper defended himself ...

रामरूप मेहता : अद्भुत योद्धा

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                         रामरूप मेहता : अद्भुत योद्धा  बिहार के अखबारों से इस वक्त नीतीश कुमार एवं जीतनरम माँझी के जोड़-तोड के खबरों के अलावा एक बहुत ही रोचक खबर आ रही है, वो है बिहार राज्य की फिल्मी दुनिया के इतिहास मे पहली बार मगही भाषा मे बनने जा रही फ़ीचर फिल्म "अजगुत जोधा"| इससे पहले केवल भोजपुरी एवं मैथिली भाषा मे ही फिल्मे बनती आ रहीं थी| यह फिल्म चर्चा मे इसलिये भी है क्योंकि इस फ़ीचर फिल्म की कहानी एक क्रांतिकारी एवं सामाजवादी नेता 'रामरूप मेहता' के जीवन के इर्द-गिर्द घूमेगी| जब की अभी तक भोजपुरी फ़ीचर फिल्मों के निर्देशक केवल "मशाला" ही पर्दे पर परोसते आ रहे है| समीक्षकों का मनना यह है की इससे बिहारी फिल्मों को एक नई दिशा मिलेगी|  फिल्म की कहानी एवं रामरूप मेहता का लघु जीवन दर्शन: "रामरूप मेहता" मगध के बेहद लोकप्रिय सामाजवादी नेता थे|बिहार राज्य के औरंगाबाद ज़िला के बिरहरा गाँव के  एक किसान परिवार मे जन्मे मेहता जी अपने तीनो भाइयों मे सबसे बड़े थें| माता के गुजर जाने के बाद अपने पिता...

आज के नेताजी

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                                आज के नेताजी  एक थे नेताजी  वो...'नेताजी' नहीं ये थे 'आज के नेताजी '  इन्होने ने भी लड़ाई लड़ी  लेकिन देश के लिए नहीं   वोट के लिए  सत्ता में आने से पहले  घोर भाषणबाजी की  बिलकुल 'नेताजी' की तरह  फर्क सिर्फ इतना था  सच कम, झूठ ज्यादा था  सत्ता में आने से पहले  इन्होने घर-घर जाकर जूते  साफ किये , तलवे चाटें, हाथ-पांव जोड़े  यहाँ तक की झाड़ू - पोंचा भी किया  लेकिन सत्ता में आने के बाद  सूद समेत वापस भी लिया  यही है 'आज के नेताजी' की क्रिया।  एक नगर में बम फटा  और नेताओं ने हिदायत दी  चल देख आएं नाक कटी  नेताजी भड़के  बोलें, अगर नगर में और बम हुआ तो ? हम उड़ जायेंगे ज्यों धुँआ  जब पांच साल ख़त्म होने को आया  तब इन्होने अपनी क्रिया फिर दोहराई  क्योंकि ये है 'आज के नेताजी'  वो.… 'नेताजी'...

एक प्रश्न

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                                       एक प्रश्न   श्रम करना  हमसे कहते हो  और नीचे से  टांग हमारी खींचते हो  विद्या को  हमसे ग्रहण करवाते हो  और चुपके से  हमारी विद्या को पैसे से तौलते हो  नन्हे से तोते को  आज़ादी की पाठ पढ़ाते हो  और उसके फड़फड़ाते ही , पिंजरे की किवाड़, झट बंद कर देते हो रँग -विरंगे फूलों को  खिलने को कहते हो  और उसके खिलते ही  तोड़ पॉकेट में रख लेते हो   बहती निर्मल नदियों को  अपने घर आमंत्रित करते हो  और उसके आते ही  दूषित उसे कर देते हो  मन में उठते सागर को  बहार लाने को कहते हो  और उसके आते ही  किसी नाले में बह जाने देते हो  नन्हे से गोताखोर को  विराट सिंधु में गोता लगाने को कहते हो  और उसके गोता लगाते ही  मंझधार में छोड़, नौका ले चल जाते हो  तुम्हारी यही द...

फिर से निरंकुश बन जाऊँ

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                          फिर से निरंकुश बन जाऊँ  मुन्ना  जी करता है ,तेरे संग गुड़कियाँ लगाऊँ  भागा -दौड़ी कर के गली में खूब शोर मचाऊँ  दिन के सूरज चढ़ते ही, आम के बगीचे में घूस जाउँ  कभी इस डाली तो कभी उस डाली  कभी किसी के हाथ न आऊँ  मुन्ना, जी करता है फिर से निरंकुश बन जाऊँ।। दिन के सूरज ढलते ही, चंदू ,सोनू ,मोनू को भी  घर -घर जाकर साथ में लाऊँ  फिर किसी खम्भे की आड़ में  झट से गिनती सौ तक गिन जाऊँ  जब तक मम्मी -पापा न आएं  तब तक वापस घर न जाऊँ  मुन्ना, जी करता है फिर से निरंकुश बन जाऊँ।। जब कभी भी बारिश हो गली में उतरकर छपकियाँ लगाऊँ  कॉपी के पन्नें फाड़कर  पानी में कश्तियाँ दौड़ाऊँ  मुन्ना, जी करता है फिर से निरंकुश बन जाऊँ।। सुबह का सूरज जब निकले  बस के हॉर्न कानो में गूंजे  झट से मम्मी टिफ़िन भर लए  तब पेट पकड़कर मैं खूब चिलाउँ  स्कूल जाने से बच जाऊँ  फिर ...

पेड़ा

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                                            पेड़ा  "अरे बेटा कितना दुबला हो गया है तु ? ले एक और पेड़ा  खा ले ", डॉक्टर साहब के लाख मना करने पर भी हलवाई दादी ने दो पेड़े उनके प्लेट में डाल दिए। इस पर डॉक्टर साहब थोड़ा खीजते हुए बोलें _दादी ये क्या कर रही है ?बार -बार मना करने के बाद भी तूने पेड़े प्लेट में डाल दिए। पता है तुझे  इनसब चीजों में कितना fat होता है ? गाँव में कुछ दिन और रहा तो मेरी  body का कबाड़ हो जायेगा। दादी ने प्यार से लालू के गाल पर हाथ फेरते हुए कहा _डॉक्टर क्या बन गया बड़ी-बड़ी बातें करने लग गया। याद नहीं तुझे कैसे बचपन में तु सुबह से शाम तक इस दुकान पर ही बैठा रहता था। यहाँ तक की खाना खाने भी घर नही जाता था। तुझे मेरे हाथ से ही खाना पसंद था इसीलिए तेरी दादी अक्सर खाना लाकर यहाँ रख जाती थी। और हाँ , आज जिस पड़े  लिए तु मना कर रहा है वो तो तुझे जान से भी प्यारा था। जब तक तेरा मन नही भर जाता था तब तक माँगते ही रहता था। द...

वो.… एक दिन

                        वो.… एक दिन                                     (१)     कॉलेज से क्लॉस बंक कर के अनुज अपने दोस्तों के साथ पास के ही मैदान में क्रिकेट खेलने चला गया। लड़के दो टीमों में बँट गए। अनुज की पहले बैटिंग की बारी आई। दो विकेट जल्दी गिर जाने के बाद अनुज थोड़ा संभल कर खेलने लगा। इसी में २-३ ओवर और गुजर गए ,टीम के बाकि खिलाड़ी तेजी से रन बनाने के लिए जोर देने लग गए। अगला ओवर विपक्षी टीम के कप्तान का था, स्ट्राइक पे खड़ा अनुज पहले के चार गेंदों पर ३ चौके और एक छके की मदद से १८ रन बना चूका था। पांचवे गेंद पर दो रन निकालने के बाद वह विकेटकीपर से जाकर बोला -"आज इस कप्तान को मुझे कॉलेज टीम में न लेने की गलती का एहसास दिलाता हुँ। अगली गेंद खाली गयी। अगली ओवर में नीतीश ने एक रन लेकर स्ट्राइक अनुज को दिया। अनुज तो पहले से हीं रंग में था लेकिन रंग में भंग डालने का काम किया पहले से उमड़ते -घुमड़ते बादलों ने। प...

खुद से लड़ाई

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                     खुद से लड़ाई  रोज सवेरे उठकर मैं , अपने आप से लड़ाई लड़ता हूँ।  अपने गलत आदतों को छोड़ने की  पल -पल प्रतिज्ञा करता हूँ , कुछ पल के लिए 'रमन एवं भाभा' को अपना आदर्श बना लेता हूँ।।                                                                         आँधी की तरह चले आतें हैं  'कुँवर' ,'भगत' एवं 'सुभाष' भी,  और अपने अंदर क्रांति की  एक चिंगारी सुलगता देखता हूँ।  योग गुरु रामदेव बाबा की  भारत स्वाभिमान की बातें मेरे अंदर की , चिंगारी को हवा दे देती हैं            और  मैं खुद को खादीधारियों से लोहा लेते पाता हूँ।। फिर राम नाम की शीतल हवा ,मेरी क्रांति चेतनाओं को  पल भर में बुझा देतीं हैं , यह माया मोह से दूर  अपन...

NAVRATRA SPECIAL

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                                          बलि  आज सुबह से ही देवलोक में व्यस्तता नजर आ रही है। खास कर चित्रगुप्त बहुत व्यस्त नजर आ रहे हैं, वे सुबह से ही फाइलों में कुछ ढूँढने की कोशिश कर रहे है। अब तक न जाने कितने फाइलों को उन्होंने उलट -पलट दिया लेकिन सफलता नही मिली। अभी वे अपनी थकान मिटाने के लिए बैठें ही थे की 'नारायण -नारायण ' करते वहां नारद मुनि पहुँच गये। चित्रगुप्त के मस्तिक पर उदासी की लकीरों को भाँफते हुए उन्होंने उदासी का कारण पूछा। चित्रगुप्त बड़े ही धीमी आवाज़ में बोले की त्रिदेवियों  (लक्ष्मी ,पार्वती एवं सरस्वती ) ने उन्हें इस नवरात्र के अवसर पर दुर्गा के सबसे बड़े भक्त के बारे में पता लगाने को कहा है लेकिन अभी तक कोई ऐसा न मिला जिसे सबसे बड़े भक्त का ख़िताब दिया जा सके। यह सुनकर नारद मुनि मुस्कुराये बोलें -बस इतनी सी बात ?गूगल बाबा पर सर्च कर लेते। चित्रगुप्त के चेहरे पर हैरानी देखकर उन्होंने अपने पॉकेट से एंड्राइड फ़ोन निकाला फिर चित्रगुप्त को दिखाते हुए...

चनाचुरवाला (लघु-कथा)

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                   चनाचुरवाला (लघु-कथा) दोपहर का समय, चिलचिलाती धूप, अचानक से आवाज़ सुनाई पड़ती   - " चना बनाया चूर ,लाया इसे इतना दूर… " मुन्ना अपने दादाजी को सोता देख धीरे से उनके बगल से उठता और फिर घर में पड़े प्लास्टिक की बोतले , टूटे  वर्तन आदि जो भी मिलता उसे उठाकर  नंगे पैर उस आवाज़ के पीछे दौड़ जाता। चनाचूरवाले के पास पहुंचकर अपने तोतले आवाज़ में बोलता-"बूढ़े दादाजी मुझे भी तनातुल दो न",और अपने हाथ में लाये हुए सामान उसे थमा देता। चनाचूर वाला प्यार से मुन्ना को समझाता-"बेटा मैंने कितनी बार तुझे बोला है की मैं प्लास्टिक की बोतलें, वर्तन आदि नहीं लेता फिर भी तू रोज ऐसी ही चीजें लता है, पैसे लाया कर पैसे " फिर मुन्ना के चेहरे पे उदासी देखकर कर  थोड़ा सा चनाचूर कागज में लपेट कर थमा देता और बोलता की ले जा बेटा तुझे खाता देख गावों के बाकि बच्चे भी चनाचूर खरीदने आएंगे लेकिन कल से पैसे जरूर लाना। इतना कहकर चनाचूर वाला आगे बढ़ जाता - " चना बनाया चूर ,लाया इसे इतना दूर… " मुन्ना रोज दोपहर में उसका इंतज़ार...

जिम्मेदार कौन ?

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                                                                               जिम्मेदार कौन ?                             आज तेरे और मेरे बीच बढ़ते  फासले का जिम्मेदार                                                        कौन है ?                               कौन है? जिसने  मेरे सिर को तेरे गोद से हटाकर                                              तकये पर टिकाया   ...